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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्रथम अध्याय

PRATHAM ADHYAY (Page 1)

विनियोग

ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः,

महाकाली देवता, गायत्री छन्दः,

नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्,

ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।
भावार्थ:

ध्यानम्

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः

शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।

नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां

यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्
ध्यान:
॥ श्रीदुर्गासप्तशती - प्रथमोऽध्यायः ॥
मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वध का प्रसंग सुनाना

॥ विनियोगः ॥
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः,

महाकाली देवता, गायत्री छन्दः,

नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्,

ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।

॥ ध्यानम् ॥
ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः

शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।

नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां

यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥

ॐ नमश्चण्डिकायै*

"ॐ ऐं" मार्कण्डेय उवाच ॥1॥

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥1॥

॥ प्रथमोऽध्यायः ॥
मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुये मधु-कैटभ वध का प्रसङ्ग सुनाना

॥ विनियोग ॥
प्रथम चरित्र के ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज, अग्नि तत्व और ऋग्वेद स्वरूप है। श्री महाकाली देवता की प्रसन्नता के लिये प्रथम चरित्र के जप में विनियोग किया जाता है।

॥ ध्यान ॥
भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिये कमलजन्मा ब्रह्माजी ने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिध, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शङ्ख धारण करती है। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अङ्गों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। उनके शरीर की कान्ति नीलमणि के समान है तथा वे दस मुख और दस पैरों से युक्त हैं।

ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है। मार्कण्डेय जी बोले - ॥1॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत
देवी माहात्म्य में 'मधु-कैटभ वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ। ॥1॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।

निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥2॥

सूर्य के पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥2॥
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः।

स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥3॥

सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुये, वही प्रसङ्ग सुनाता हूँ ॥3॥
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः।

सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥4॥

पूर्वकाल की बात है, स्वारोचिष मन्वन्तर में सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्रवंश में उत्पन्न हुये थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था ॥4॥
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान्।

बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥5॥

वे प्रजा का अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे; तो भी उस समय कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये ॥5॥
तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः।

न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥6॥

राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये ॥6॥

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