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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्रथम अध्याय

PRATHAM ADHYAY (Page 6)

राजोवाच ॥39॥

राजा ने कहा - ॥39॥
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥40॥

भगवन्! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये ॥40॥
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना।

ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥41॥

मेरा चित्त अपने अधीन न होने के कारण वह बात मेरे मन को बहुत दुःख देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अङ्गों में मेरी ममता बनी हुई है ॥41॥
जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।

अयं च निकृतः* पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥42॥

मुनिश्रेष्ठ! यह जानते हुये भी कि वह मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिये दुःख होता है; यह क्या है? इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र,स्त्री और भृत्यों ने इसे छोड़ दिया है ॥42॥
स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति।

एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥43॥

स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी यह उनके प्रति अत्यन्त हार्दिक स्नेह रखता है। इस प्रकार यह तथा मैं दोनों ही बहुत दुःखी हैं ॥43॥
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ।

तत्किमेतन्महाभाग* यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥44॥

जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हम में जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेक शून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है ॥44-45॥
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥45॥

जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हम में जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेक शून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है ॥44-45॥
ऋषिरुवाच ॥46॥

ऋषि बोले - ॥46॥

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