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SHRI DURGA SAPTSHATI

प्रथम अध्याय

PRATHAM ADHYAY (Page 4)

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः।

सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ॥23॥

मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रों से वञ्चित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओ ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसीलिये दुःखी होकर मैं वन में चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों की कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है? ॥22-24॥
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः।

किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥24॥

मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रों से वञ्चित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओ ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसीलिये दुःखी होकर मैं वन में चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों की कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है? ॥22-24॥
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥25॥

वे मेरे पुत्र कैसे है? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं? ॥25॥
राजोवाच ॥26॥

राजा ने पूछा - ॥26॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥27॥

जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति चित्त में इतना स्नेह का बन्धन क्यों है ॥27-28॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥28॥

जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति चित्त में इतना स्नेह का बन्धन क्यों है ॥27-28॥
वैश्य उवाच ॥29॥

वैश्य बोला - ॥29॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ॥30॥

आप मेरे विषय में जैसी बात कहते हैं, वह सब ठीक है ॥30॥

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