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SHRI DURGA SAPTSHATI

अष्टम अध्याय

ASHTAM ADHYAY (Page 2)

आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम्।

ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥8॥

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
रक्तबीजवधो नामाष्टमोऽध्यायः ॥8॥

उसकी अत्यन्त भयंकर सेना आती देख चण्डिकाने अपने धनुषकी टंकारसे पृथ्वी और आकाशके बीचका भाग गुँजा दिया ॥8॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत
देवी माहात्म्य में 'रक्तबीज-वध' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥8॥
ततः* सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप।

घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका* चोपबृंहयत् ॥9॥

राजन्! तदनन्तर देवीके सिंहने भी बड़े जोर-जोरसे दहाड़ना आरम्भ किया, फिर अम्बिकाने घण्टेके शब्दसे उस ध्वनिको और भी बढ़ा दिया ॥9॥
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा।

निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥10॥

धनुषकी टंकार, सिंहकी दहाड़ और घण्टेकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं। उस भयंकर शब्दसे कालीने अपने विकराल मुखको और भी बढ़ा लिया तथा इस प्रकार वे विजयिनी हुई ॥10॥
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम्।

देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥11॥

उस तुमुल नादको सुनकर दैत्योंकी सेनाओंने चारों ओर से आकर चण्डिकादेवी, सिंह तथा कालीदेवीको क्रोधपूर्वक घेर लिया ॥11॥
एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम्।

भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ॥12॥

राजन्! इसी बीचमें असुरोंके विनाश तथा देवताओंके अभ्युदयके लिये ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवोंकी शक्तियाँ, जो अत्यन्त पराक्रम और बलसे सम्पन्न थीं, उनके शरीरोंसे निकलकर उन्हींके रूपमें चण्डिकादेवीके पास गयीं ॥12-13॥
ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः।

शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥13॥

राजन्! इसी बीचमें असुरोंके विनाश तथा देवताओंके अभ्युदयके लिये ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवोंकी शक्तियाँ, जो अत्यन्त पराक्रम और बलसे सम्पन्न थीं, उनके शरीरोंसे निकलकर उन्हींके रूपमें चण्डिकादेवीके पास गयीं ॥12-13॥
यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम्।

तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ ॥14॥

जिस देवताका जैसा रूप, जैसी वेश-भूषा और जैसा वाहन है, ठीक वैसे ही, साधनोंसे सम्पन्न हो उसकी शक्ति असुरोंसे युद्ध करनेके लिये आयी ॥14॥
हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः।

आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते ॥15॥

सबसे पहले हंसयुक्त विमानपर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमण्डलुसे सुशोभित ब्रह्माजीकी शक्ति उपस्थित हुई, जिसे 'ब्रह्माणी' कहते हैं ॥15॥

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