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SHRI DURGA SAPTSHATI

अष्टम अध्याय

ASHTAM ADHYAY (Page 5)

तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान्।

खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरत्तदा ॥32॥
कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः।

ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति ॥33॥

फिर काली उनके आगे होकर शत्रुओंको शूलके प्रहारसे विदीर्ण करने लगी और खट्वाङ्गसे उनका कचूमर निकालती हुई रणभूमिमें विचरने लगी ॥33॥

ब्रह्माणी भी जिस-जिस ओर दौड़ती, उसी उसी और अपने कमण्डलुका जल छिड़ककर शत्रुओंके ओज और पराक्रमको नष्ट कर देती थी ॥33॥
माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी।

दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना ॥34॥

माहेश्वरीने त्रिशूलसे तथा वैष्णवीने चक्रसे और अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई कुमार कार्तिकेयकी शक्तिने शक्तिसे दैत्योंका संहार आरम्भ किया ॥34॥
ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः।

पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥35॥

इन्द्रशक्तिके वज्रप्रहारसे विदीर्ण हो सैकड़ों दैत्य-दानव रक्तकी धारा बहाते हुए पृथ्वीपर सो गये ॥35॥
तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः।

वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥36॥

वाराही शक्तिने कितनोंको अपनी थूथुनकी मारसे नष्ट किया, दाढ़ोंके अग्रभागसे कितनोंकी छाती छेद डाली तथा कितने ही दैत्य उसके चक्रकी चोटसे विदीर्ण होकर गिर पड़े ॥36॥
नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान्।

नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगम्बरा ॥37॥

नारसिंही भी दूसरे दूसरे महादैत्योंको अपने नखोंसे विदीर्ण करके खाती और सिंहनादसे दिशाओं एवं आकाशको गुंजाती हुई युद्ध क्षेत्रमें विचरने लगी ॥37॥
चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः।

पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥38॥

कितने ही असुर शिवदूतीके प्रचण्ड अट्टहाससे अत्यन्त भयभीत हो पृथ्वीपर गिर पड़े और गिरनेपर उन्हें शिवदूतीने उस समय अपना ग्रास बना लिया ॥38॥
इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्।

दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥39॥

इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए मातृगणोंको नाना प्रकारके उपायोंसे बड़े-बड़े असुरोंका मर्दन करते देख दैत्यसैनिक भाग खड़े हुए ॥39॥

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