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SHRI DURGA SAPTSHATI

अष्टम अध्याय

ASHTAM ADHYAY (Page 3)

माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी।

महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥16॥

महादेवजीकी शक्ति वृषभपर आरूढ़ हो हाथोंमें श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किये महानागका कङ्कण पहने, मस्तकमें चन्द्ररेखासे विभूषित हो वहाँ आ पहुँची ॥16॥
कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना।

योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ॥17॥

कार्तिकेयजीकी शक्तिरूपा जगदम्बिका उन्हींका रूप धारण किये श्रेष्ठ मयूरपर आरूढ़ हो हाथमें शक्ति लिये दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये आयीं ॥17॥
तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता।

शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥18॥

इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी शक्ति गरुड़पर विराजमान हो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष तथा खड्ग हाथमें लिये वहाँ आयी ॥18॥
यज्ञवाराहमतुलं* रूपं या बिभ्रतो* हरेः।

शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥19॥

अनुपम यज्ञवाराहका रूप धारण करनेवाले श्रीहरिकी जो शक्ति है, वह भी वाराह शरीर धारण करके वहाँ उपस्थित हुई ॥19॥
नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।

प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥20॥

नारसिंही शक्ति भी नृसिंहके समान शरीर धारण करके वहाँ आयी। उसकी गर्दनके बालोंके झटकेसे आकाशके तारे बिखरे पड़ते थे ॥20॥
वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता।

प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥21॥

इसी प्रकार इन्द्रकी शक्ति वज्र हाथमें लिये गजराज ऐरावतपर बैठकर आयी। उसके भी सहस्र नेत्र थे। इन्द्रका जैसा रूप है, वैसा ही उसका भी था ॥21॥
ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः।

हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याऽऽह चण्डिकाम् ॥22॥

तदनन्तर उन देव शक्तियोंसे घिरे हुए महादेवजीने चण्डिकासे कहा- 'मेरी प्रसन्नताके लिये तुम शीघ्र ही इन असुरोंका संहार करो' ॥22॥
ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा।

चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥23॥

तब देवीके शरीरसे अत्यन्त भयानक और परम उग्र चण्डिका-शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों गीदड़ियोंकी भाँति आवाज करनेवाली थी ॥23॥

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