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SHRI DURGA SAPTSHATI

अष्टम अध्याय

ASHTAM ADHYAY (Page 7)

वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः।

सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥48॥

वैष्णवीके चक्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे जो रक्त बहा और उससे जो उसीके बराबर आकारवाले सहस्रों महादैत्य प्रकट हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया ॥48॥
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना।

माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥49॥

कौमारीने शक्तिसे, वाराहीने खड्गसे और माहेश्वरीने त्रिशूलसे महादैत्य रक्तबीजको घायल किया ॥49॥
स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक्।

मातॄः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥50॥

क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीजने भी गदासे सभी मातृ-शक्तियोंपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥50॥
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि।

पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥51॥

शक्ति और शूल आदिसे अनेक बार घायल होनेपर जो उसके शरीरसे रक्तकी धारा पृथ्वीपर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए ॥51॥
तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्।

व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥52॥

इस प्रकार उस महादैत्यके रक्तसे प्रकट हुए असुरोंद्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। इससे उन देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥52॥
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा।

उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं* वदनं कुरु ॥53॥

देवताओंको उदास देख चण्डिकाने कालीसे शीघ्रतापूर्वक कहा - 'चामुण्डे! तुम अपना मुख और भी फैलाओ ॥53॥
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान्।

रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना* ॥54॥

तथा मेरे शस्त्रपातसे गिरनेवाले रक्तबिन्दुओं और उनसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंको तुम अपने इस उतावले मुखसे खा जाओ ॥54॥
भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान्।

एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥55॥

इस प्रकार रक्तसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंका भक्षण करती हुई तुम रणमें विचरती रहो। ऐसा करनेसे उस दैत्यका सारा रक्त क्षीण हो जानेपर वह स्वयं भी नष्ट हो जायगा ॥55॥

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