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SHRI DURGA SAPTSHATI

अष्टम अध्याय

ASHTAM ADHYAY (Page 6)

पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान्।

योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥40॥

मातृगणोंसे पीड़ित दैत्योंको युद्धसे भागते देख रक्तबीज नामक महादैत्य क्रोधमें भरकर युद्ध करनेके लिये आया ॥40॥
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः।

समुत्पतति मेदिन्यां* तत्प्रमाणस्तदासुरः ॥41॥

उसके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर गिरती, तब उसीके समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पृथ्वीपर पैदा हो जाता ॥41॥
युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः।

ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥42॥

महासुर रक्तबीज हाथमें गदा लेकर इन्द्रशक्तिके साथ युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्रीने अपने वज्रसे रक्तबीजको मारा ॥42॥
कुलिशेनाहतस्याशु बहु* सुस्राव शोणितम्।

समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥43॥

वज्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे बहुत-सा रक्त चूने लगा और उससे उसीके समान रूप तथा पराक्रमवाले योद्धा उत्पन्न होने लगे ॥43॥
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः।

तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥44॥

उसके शरीरसे रक्तकी जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये। वे सब रक्तबीजके समान ही वीर्यवान्, बलवान् तथा पराक्रमी थे ॥44॥
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः।

समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥45॥

वे रक्तसे उत्पन्न होनेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए वहाँ मातृगणोंके साथ घोर युद्ध करने लगे ॥45॥
पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा।

ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥46॥

पुनः वज्रके प्रहारसे जब उसका मस्तक घायल हुआ, तब रक्त बहने लगा और उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गये ॥46॥
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह।

गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥47॥

वैष्णवीने युद्धमें रक्तबीजपर चक्रका प्रहार किया तथा ऐन्द्रीने उस दैत्यसेनापतिको गदासे चोट पहुँचायी ॥47॥

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