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SHRI DURGA SAPTSHATI

अष्टम अध्याय

ASHTAM ADHYAY (Page 8)

भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे*।

इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम् ॥56॥

उन भयंकर दैत्योंको जब तुम खा जाओगी, तब दूसरे नये दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेंगे।' कालीसे यों कहकर चण्डिका देवीने शूलसे रक्तबीजको मारा ॥56॥
मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्।

ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥57॥

और कालीने अपने मुखमें उसका रक्त ले लिया। तब उसने वहाँ चण्डिकापर गदासे प्रहार किया ॥57॥
न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि।

तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥58॥

किंतु उस गदापातने देवीको तनिक भी वेदना नहीं पहुँचायी। रक्तबीजके घायल शरीरसे बहुत-सा रक्त गिरा ॥58॥
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति।

मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ॥59॥

किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डाने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीजका रक्त भी पी लिया। तदनन्तर देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डाने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे मार डाला। राजन्! इस प्रकार शस्त्रोंके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर! इससे देवताओंको अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥59-62॥
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम्।

देवी शूलेन वज्रेण* बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः ॥60॥

किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डाने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीजका रक्त भी पी लिया। तदनन्तर देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डाने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे मार डाला। राजन्! इस प्रकार शस्त्रोंके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर! इससे देवताओंको अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥59-62॥
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम्।

स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः* ॥61॥

किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डाने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीजका रक्त भी पी लिया। तदनन्तर देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डाने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे मार डाला। राजन्! इस प्रकार शस्त्रोंके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर! इससे देवताओंको अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥59-62॥
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः।

ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥62॥

किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डाने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीजका रक्त भी पी लिया। तदनन्तर देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डाने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे मार डाला। राजन्! इस प्रकार शस्त्रोंके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर! इससे देवताओंको अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥59-62॥
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः॥ॐ ॥63॥

और मातृगण उन असुरोंके रक्तपानके मदसे उद्धत-सा होकर नृत्य करने लगा ॥63॥

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