ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

अष्टम अध्याय

ASHTAM ADHYAY (Page 4)

सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता।

दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः ॥24॥

उस अपराजिता देवीने धूमिल जटावाले महादेवजीसे कहा- 'भगवन्! आप शुम्भ-निशुम्भके पास दूत बनकर जाइये ॥24॥
ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ।

ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥25॥

और उन अत्यन्त गर्वीले दानव शुम्भ एवं निशुम्भ दोनोंसे कहिये। साथ ही उनके अतिरिक्त भी जो दानव युद्धके लिये वहाँ उपस्थित हों उनको भी यह सन्देश दीजिये' - ॥25॥
त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः।

यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥26॥

'दैत्यो! यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो पातालको लौट जाओ। इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य मिल जाय और देवता यज्ञभागका उपभोग करें ॥26॥
बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः।

तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥27॥

यदि बलके घमंडमें आकर तुम युद्धकी अभिलाषा रखते हो तो आओ मेरी शिवाएं (योगिनियाँ) तुम्हारे कच्चे मांससे तृप्त हों ॥27॥
यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयम्।

शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥28॥

चूँकि उस देवीने भगवान् शिवको दूतके कार्यमें नियुक्त किया था, इसलिये वह 'शिवदूती' के नामसे संसारमें विख्यात हुई ॥28॥
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः।

अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र* कात्यायनी स्थिता ॥29॥

वे महादैत्य भी भगवान् शिवके मुँहसे देवीके वचन सुनकर क्रोधमें भर गये और जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं, उस ओर बढ़े ॥29॥
ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः।

ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥30॥

तदनन्तर वे दैत्य अमर्षमें भरकर पहले ही देवीके ऊपर बाण, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्रोंकी वृष्टि करने लगे ॥30॥
सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान्।

चिच्छेद लीलयाऽऽध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥31॥

तब देवीने भी खेल खेलमें ही धनुषकी टंकार की और उससे छोड़े हुए बड़े-बड़े बाणोंद्वारा दैत्योंके चलाये हुए बाण, शूल, शक्ति और फरसोंको काट डाला ॥31॥

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.