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SHRI DURGA SAPTSHATI

पंचम अध्याय

PANCHAM ADHYAY (Page 11)

नमस्तस्यै ॥79॥

जो देवी चैतन्यरूपसे इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है ॥78-80॥
नमस्तस्यै नमो नमः ॥80॥

जो देवी चैतन्यरूपसे इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है ॥78-80॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥81॥

पूर्वकालमें अपने अभीष्टकी प्राप्ति होनेसे देवताओंने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्रने बहुत दिनोंतक जिनका सेवन किया, वह कल्याणकी साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियोंका नाश कर डाले ॥81॥
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।

या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥82॥

उद्दण्ड दैत्योंसे सताये हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरीको इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्तिसे विनम्र पुरुषोंद्वारा स्मरण की जानेपर तत्काल ही सम्पूर्ण विपत्तियोंका नाश कर देती हैं, वे जगदम्बा हमारा संकट दूर करें ॥82॥
ऋषिरुवाच ॥83॥

ऋषि कहते हैं - ॥83॥
एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।

स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन ॥84॥

राजन्! इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे, उस समय पार्वती देवी गङ्गाजीके जलमें स्नान करने के लिये वहाँ आयीं ॥84॥
साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।

शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा ॥85॥

उन सुन्दर भौंहोंवाली भगवतीने देवताओंसे पूछा - 'आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं?' तब उन्हींके शरीरकोशसे प्रकट हुई शिवादेवी बोलीं - ॥85॥
स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः।

देवैः समेतैः* समरे निशुम्भेन पराजितैः ॥86॥

'शुम्भ दैत्यसे तिरस्कृत और युद्धमें निशुम्भसे पराजित हो यहाँ एकत्रित हुए ये समस्त देवता यह मेरी ही स्तुति कर रहे हैं' ॥86॥

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