शरीर*कोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति* समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ॥87॥
पार्वतीजीके शरीरकोशसे अम्बिकाका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये वे समस्त लोकोंमें 'कौशिकी' कही जाती हैं ॥87॥
कौशिकीति* समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ॥87॥
पार्वतीजीके शरीरकोशसे अम्बिकाका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये वे समस्त लोकोंमें 'कौशिकी' कही जाती हैं ॥87॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया ॥88॥
कौशिकीके प्रकट होनेके बाद पार्वतीदेवीका शरीर काले रंगका हो गया, अतः वे हिमालयपर रहनेवाली कालिकादेवीके नामसे विख्यात हुईं ॥88॥
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया ॥88॥
कौशिकीके प्रकट होनेके बाद पार्वतीदेवीका शरीर काले रंगका हो गया, अतः वे हिमालयपर रहनेवाली कालिकादेवीके नामसे विख्यात हुईं ॥88॥
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ॥89॥
तदनन्तर शुम्भ-निशुम्भके भृत्य चण्ड-मुण्ड वहाँ आये और उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करनेवाली अम्बिकादेवीको देखा ॥89॥
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ॥89॥
तदनन्तर शुम्भ-निशुम्भके भृत्य चण्ड-मुण्ड वहाँ आये और उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करनेवाली अम्बिकादेवीको देखा ॥89॥
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम् ॥90॥
फिर वे शुम्भके पास जाकर बोले- 'महाराज! एक अत्यन्त मनोहर स्त्री है, जो अपनी दिव्य कान्तिसे हिमालयको प्रकाशित कर रही है' ॥90॥
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम् ॥90॥
फिर वे शुम्भके पास जाकर बोले- 'महाराज! एक अत्यन्त मनोहर स्त्री है, जो अपनी दिव्य कान्तिसे हिमालयको प्रकाशित कर रही है' ॥90॥
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ॥91॥
वैसा उत्तम रूप कहीं किसीने भी नहीं देखा होगा। असुरेश्वर! पता लगाइये, वह देवी कौन है और उसे ले लीजिये ॥91॥
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ॥91॥
वैसा उत्तम रूप कहीं किसीने भी नहीं देखा होगा। असुरेश्वर! पता लगाइये, वह देवी कौन है और उसे ले लीजिये ॥91॥
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥92॥
स्त्रियोंमें तो वह रत्न है, उसका प्रत्येक अङ्ग बहुत ही सुन्दर है। तथा वह अपने श्रीअङ्गोंकी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश फैला रही है। दैत्यराज! अभी वह हिमालयपर ही मौजूद है, आप उसे देख सकते हैं ॥92॥
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥92॥
स्त्रियोंमें तो वह रत्न है, उसका प्रत्येक अङ्ग बहुत ही सुन्दर है। तथा वह अपने श्रीअङ्गोंकी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश फैला रही है। दैत्यराज! अभी वह हिमालयपर ही मौजूद है, आप उसे देख सकते हैं ॥92॥
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे ॥93॥
प्रभो! तीनों लोकोंमें मणि, हाथी और घोड़े आदि जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके घरमें शोभा पाते हैं ॥93॥
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे ॥93॥
प्रभो! तीनों लोकोंमें मणि, हाथी और घोड़े आदि जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके घरमें शोभा पाते हैं ॥93॥
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात्।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥94॥
हाथियों में रत्नभूत ऐरावत, यह पारिजात का वृक्ष और यह उच्चैःश्रवा घोड़ा - यह सब आपने इन्द्रसे ले लिया है ॥94॥
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥94॥
हाथियों में रत्नभूत ऐरावत, यह पारिजात का वृक्ष और यह उच्चैःश्रवा घोड़ा - यह सब आपने इन्द्रसे ले लिया है ॥94॥