इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम।
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु ॥103॥
चण्ड-मुण्डका यह वचन सुनकर शुम्भने महादैत्य सुग्रीवको दूत बनाकर देवीके पास भेजा और कहा - 'तुम मेरी आज्ञासे उसके सामने ये-ये बातें कहना और ऐसा उपाय करना जिससे प्रसन्न होकर वह शीघ्र ही यहाँ आ जाय' ॥102-103॥
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु ॥103॥
चण्ड-मुण्डका यह वचन सुनकर शुम्भने महादैत्य सुग्रीवको दूत बनाकर देवीके पास भेजा और कहा - 'तुम मेरी आज्ञासे उसके सामने ये-ये बातें कहना और ऐसा उपाय करना जिससे प्रसन्न होकर वह शीघ्र ही यहाँ आ जाय' ॥102-103॥
स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने।
सा* देवी तां ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥104॥
वह दूत पर्वतके अत्यन्त रमणीय प्रदेशमें जहाँ देवी मौजूद थीं, गया और मधुर वाणीमें कोमल वचन बोला ॥104॥
सा* देवी तां ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥104॥
वह दूत पर्वतके अत्यन्त रमणीय प्रदेशमें जहाँ देवी मौजूद थीं, गया और मधुर वाणीमें कोमल वचन बोला ॥104॥
दूत उवाच ॥105॥
दूत बोला - ॥105॥
दूत बोला - ॥105॥
देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः।
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥106॥
देवि! दैत्यराज शुम्भ इस समय तीनों लोकोंके परमेश्वर हैं। मैं उन्हींका भेजा हुआ दूत हूँ और यहाँ तुम्हारे ही पास आया हूँ ॥106॥
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥106॥
देवि! दैत्यराज शुम्भ इस समय तीनों लोकोंके परमेश्वर हैं। मैं उन्हींका भेजा हुआ दूत हूँ और यहाँ तुम्हारे ही पास आया हूँ ॥106॥
अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु।
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥107॥
उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक स्वरसे मानते हैं। कोई उसका उल्लङ्घन नहीं कर सकता। वे सम्पूर्ण देवताओंको परास्त कर चुके हैं। उन्होंने तुम्हारे लिये जो सन्देश दिया है, उसे सुनो ॥107॥
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥107॥
उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक स्वरसे मानते हैं। कोई उसका उल्लङ्घन नहीं कर सकता। वे सम्पूर्ण देवताओंको परास्त कर चुके हैं। उन्होंने तुम्हारे लिये जो सन्देश दिया है, उसे सुनो ॥107॥
मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः।
यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ॥108॥
'सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकारमें है। देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हैं। सम्पूर्ण यज्ञोंके भागोंको मैं ही पृथक्-पृथक् भोगता हूँ ॥108॥
यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ॥108॥
'सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकारमें है। देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हैं। सम्पूर्ण यज्ञोंके भागोंको मैं ही पृथक्-पृथक् भोगता हूँ ॥108॥
त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः।
तथैव गजरत्नं* च हृत्वा* देवेन्द्रवाहनम् ॥109॥
तीनों लोकोंमें जितने श्रेष्ठ रत्न हैं, वे सब मेरे अधिकारमें हैं। देवराज इन्द्रका वाहन ऐरावत, जो हाथियोंमें रत्नके समान है, मैंने छीन लिया है ॥109॥
तथैव गजरत्नं* च हृत्वा* देवेन्द्रवाहनम् ॥109॥
तीनों लोकोंमें जितने श्रेष्ठ रत्न हैं, वे सब मेरे अधिकारमें हैं। देवराज इन्द्रका वाहन ऐरावत, जो हाथियोंमें रत्नके समान है, मैंने छीन लिया है ॥109॥
क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः।
उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥110॥
क्षीरसागरका मन्थन करनेसे जो अश्वरत्न उच्चैःश्रवा प्रकट हुआ था, उसे देवताओंने मेरे पैरोंपर पड़कर समर्पित किया है ॥110॥
उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥110॥
क्षीरसागरका मन्थन करनेसे जो अश्वरत्न उच्चैःश्रवा प्रकट हुआ था, उसे देवताओंने मेरे पैरोंपर पड़कर समर्पित किया है ॥110॥