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SHRI DURGA SAPTSHATI

पंचम अध्याय

PANCHAM ADHYAY (Page 15)

यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च।

रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ॥111॥

सुन्दरी! उनके सिवा और भी जितने रत्नभूत पदार्थ देवताओं, गन्धर्वों और नागों के पास थे, वे सब मेरे ही पास आ गये हैं ॥111॥
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्।

सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम् ॥112॥

देवि! हमलोग तुम्हें संसारकी स्त्रियोंमें रत्न मानते हैं, अतः तुम हमारे पास आ जाओ; क्योंकि रत्नोंका उपभोग करनेवाले हम ही हैं ॥112॥
मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम्।

भज त्वं च चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः ॥113॥

चञ्चल कटाक्षोंवाली सुन्दरी! तुम मेरी या मेरे भाई महापराक्रमी निशुम्भकी सेवामें आ जाओ; क्योंकि तुम रत्नस्वरूपा हो ॥113॥
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात्।

एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज ॥114॥

मेरा वरण करनेसे तुम्हें तुलनारहित महान् ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी। अपनी बुद्धिसे यह विचारकर तुम मेरी पत्नी बन जाओ' ॥114॥
ऋषिरुवाच ॥115॥

ऋषि कहते हैं - ॥115॥
इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ।

दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत् ॥116॥

दूतके यों कहनेपर कल्याणमयी भगवती दुर्गादेवी, जो इस जगत्को धारण करती हैं, मन-ही-मन गम्भीरभावसे मुसकरायीं और इस प्रकार बोलीं - ॥116॥
देव्युवाच ॥117॥

देवीने कहा - ॥117॥
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्।

त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः ॥118॥

दूत! तुमने सत्य कहा है, इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। शुम्भ तीनों लोकोंका स्वामी है और निशुम्भ भी उसीके समान पराक्रमी है ॥118॥

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