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SHRI DURGA SAPTSHATI

पंचम अध्याय

PANCHAM ADHYAY (Page 16)

किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्।

श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा ॥119॥

किंतु इस विषयमें मैंने जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसे मिथ्या कैसे करूँ? मैंने अपनी अल्पबुद्धिके कारण पहलेसे जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे सुनो - ॥119॥
यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।

यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥120॥

'जो मुझे संग्राममें जीत लेगा, जो मेरे अभिमानको चूर्ण कर देगा तथा संसारमें जो मेरे समान बलवान् होगा, वही मेरा स्वामी होगा' ॥120॥
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः।

मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु ॥121॥

इसलिये शुम्भ अथवा महादैत्य निशुम्भ स्वयं ही यहाँ पधारें और मुझे जीतकर शीघ्र ही मेरा पाणिग्रहण कर लें, इसमें विलम्ब की क्या आवश्यकता है? ॥121॥
दूत उवाच ॥122॥

दूत बोला - ॥122॥
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः।

त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः ॥123॥

देवि! तुम घमंडमें भरी हो, मेरे सामने ऐसी बातें न करो। तीनों लोकोंमें कौन ऐसा पुरुष है, जो शुम्भ- निशुम्भके सामने खड़ा हो सके ॥123॥
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि।

तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका ॥124॥

देवि! अन्य दैत्योंके सामने भी सारे देवता युद्धमें नहीं ठहर सकते, फिर तुम अकेली स्त्री होकर कैसे ठहर सकती हो ॥124॥
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे।

शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम् ॥125॥

जिन शुम्भ आदि दैत्योंके सामने इन्द्र आदि सब देवता भी युद्धमें खड़े नहीं हुए, उनके सामने तुम स्त्री होकर कैसे जाओगी ॥125॥
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः।

केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि ॥126॥

इसलिये तुम मेरे ही कहनेसे शुम्भ निशुम्भके पास चली चलो। ऐसा करनेसे तुम्हारे गौरवकी रक्षा होगी; अन्यथा जब वे केश पकड़कर घसीटेंगे, तब तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा खोकर जाना पड़ेगा ॥126॥

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